साभार : बीबीसी
अयोध्या विवाद को लेकर वर्ष 1989 से हाईकोर्ट में चार मुकदमों की एक साथ सुनवाई हो रही है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट को अयोध्या विवाद के चारों मामलों में विवाद के कुल सौ से अधिक बिंदुओं पर अपना फैसला देना है.
इन सभी का केंद्र 130 गुना 90 फीट की वह ज़मीन है, जिस पर विवादित मस्जिद के तीनों गुम्बद खड़े थे और जिसे हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान कहते हैं.
22/23 दिसंबर, 1949 को यहाँ कथित तौर पर चोरी छिपे भगवान राम और सीता की मूर्तियां रखने के बाद ज़िला प्रशासन ने विवादित इमारत को कुर्क कर लिया था.
कुर्की पर कार्रवाई की सुनवाई के दौरान ही जनवरी, 1950 में भगवान सिंह विशारद की याचिका पर फैजाबाद की एक सिविल कोर्ट ने मूर्तियों को हटाने पर रोक लगा दी थी.
कोर्ट ने विवादित परिसर के अंदर सीमित तौर पर पूजा अर्चना के लिए रिसीवर नियुक्त कर दिया था.

कई पक्ष

इसके बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा, 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड और 1989 में भगवान राम और जन्मस्थान की ओर से विश्व हिंदू परिषद के नेता देवकी नंदन अग्रवाल ने चौथा मुकदमा दायर किया.
गुरूवार को हाईकोर्ट को मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर फैसला देना है कि क्या विवादित स्थल भगवान राम की जन्म भूमि है? क्या सन 1528 में वहाँ स्थित कोई पुराना मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी और क्या इस्लामी कानून के मुताबिक वह मस्जिद जायज़ है?
वर्ष 1989 से हाईकोर्ट में इन सब मुकदमों की एक साथ सुनवाई हो रही है.
गुरूवार को हाईकोर्ट को मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर फैसला देना है कि क्या विवादित स्थल भगवान राम की जन्म भूमि है? क्या सन 1528 में वहाँ स्थित कोई पुराना मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी और क्या इस्लामी कानून के मुताबिक वह मस्जिद जायज़ है?
क्या 22/23 दिसंबर, 1949 को मस्जिद के अंदर चोरी छिपे मूर्तियां रख दी गयी थीं अथवा वहाँ हमेशा से मूर्तियों की पूजा होती रही है.
कोर्ट को इस बिंदु पर भी फैसला देना है कि क्या ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वर्ष 1885-86 में निर्मोही अखाड़ा के उस मुकदमे का फै़सला अभी लागू है, जिसमें राम चबूतरे पर मंदिर बनाने की अर्जी नामंजूर कर दी गयी थी.
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि निर्मोही अखाड़े ने उस समय केवल राम चबूतरे पर दावा किया था, न कि मस्जिद पर.

दीर्घकालीन कब्ज़ा

इसी के साथ दोनों ओर से विवाद का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि उनका दीर्घकालीन कब्ज़ा विवादित इमारत पर रहा है.
अयोध्या में एक अस्थाई मंदिर
पिछले साठ सालों में विवादित परिसर का भूगोल बिलकुल बदल गया है.
इस कब्ज़े से दोनों पक्षों का दावा अपने-अपने स्तर पर पुख्ता हो गया है.
मुस्लिम पक्ष के मुताबिक़ वह इमारत 1528 से 1949 तक लगातार लंबे समय तक मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होती रही है.
दूसरी ओर हिंदू पक्ष कहता है कि कम से कम 1934 के दंगे के बाद से वहाँ मूर्तियों की पूजा हो रही और मुसलमान नमाज़ नहीं पढ़ पाए हैं.
अदालत को इन दोनों दलीलों के आधार पर अपना निर्णय देना है.
कुछ तकनीकी बिंदुओं पर भी अदालत को निर्णय देना है मसलन क्या ये मुकदमे निर्धारित समय सीमा में दायर किए गए, क्या मुकदमा करने वालों ने सरकार को ज़रुरी नोटिस दिया था और क्या इस मामले में उन्हें मुक़दमा दायर करने का कानूनी अधिकार था.

सुप्रीम कोर्ट में अपील

1989 में इस मुक़दमे को ज़िला अदालत से अपने पास मंगाकर हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के रूप में मामले की सुनवाई की है.
हाईकोर्ट को मूल मुक़दमे के साथ ही साथ फरवरी, 1986 में विवादित परिसर का ताला खोलने के ज़िला जज के फै़सले के ख़िलाफ़ अपील पर भी अपना निर्णय देना है.
अदालत का जो भी फैसला हो यह तय है कि किसी न किसी पक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी.
पक्षकार चाहें तो आपसी बातचीत फिर से शुरू कर सकते हैं. इसलिए हाईकोर्ट के इस फैसले पर सरकार को तुरंत अमल की जरूरत नहीं होगी.
हाईकोर्ट को मूल मुक़दमे के साथ ही साथ फरवरी, 1986 में विवादित परिसर का ताला खोलने के ज़िला जज के फै़सले के ख़िलाफ़ अपील पर भी अपना निर्णय देना है.
पिछले 60 वर्षों में विवादित परिसर का भूगोल बिलकुल बदल गया है.
विवादित मस्जिद छह दिसंबर, 1992 को उग्र कारसेवकों द्वारा तोड़ दी गई थी.
इसके बाद केंद्र सरकार ने आसपास के मंदिरों आदि की ज़मीनों को मिलाकर लगभग 70 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर लिया था, ताकि मूल विवाद पर अदालत के फै़सले को लागू करने में आसानी हो.

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