साभार : बीबीसी

न्यायालय को दिए गए अयोध्या स्थल के नक्शे में बंटवारे वाले हिस्से देखे जा सकते हैं
एक ऐतिहासिक फ़ैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल को राम जन्मभूमि घोषित किया है.
हाईकोर्ट ने बहुमत से फ़ैसला किया है कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए. वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा.

लेकिन अदालत ने यह भी पाया कि चूंकि कुछ हिस्सों पर, जिसमें सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है, निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा.
मैं इस फ़ैसले का इस्तक़बाल करता हूं और इस फ़ैसले से बाबरी मस्जिद के नाम पर चल रहा राजनीतिक अखाड़ा बंद होगा
90-वर्षीय याचिकाकर्ता हाशिम अंसारी
अदालत के दो जजों ने यह फ़ैसला भी दिया है कि इस भूमि के कुछ हिस्सों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए ज़मीन का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए.
तीन जजों की पूर्ण विशेष पीठ का यह पूरा फैसला लगभग दस हज़ार पन्नों का है.

वक्फ़ बोर्ड को एक तिहाई हिस्सा

तीनों जजों ने मुसलमानों के सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड के अपने दावे को कानूनन समय सीमा की मियाद बाहर होने के तकनीकी आधार पर ख़ारिज कर दिया है.
फिर भी दो जजों न्यायमूर्ति एस यू खान और न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने बहुमत से भगवान सिंह विशारद के मुक़दमे में प्रतिवादी के नाते सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को एक तिहाई हिस्से का हक़दार माना है.

जजों ने माना है कि विवादित मस्जिद के अंदर भगवान राम की मूर्तियां 22/23 दिसंबर 1949 को रखी गई. यह भी माना है कि मस्जिद का निर्माण बाबर अथवा उसके आदेश पर किया गया और यह जगह भगवान राम का जन्म स्थान है .
अदालत ने यह भी माना है किस भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में वहाँ एक विशाल प्राचीन मदिर के अवशेष मिले हैं , जिसके खंडहर पर मस्जिद बनी. लेकिन तीनों जजों में इस पर मतभेद है कि मस्जिद बनाते समय पुराना मंदिर तोड़ा गया.
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जमीन बंटवारे में सहूलियत के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिग्रहीत 70 एकड़ ज़मीन को शामिल किया जाएगा.
ज़मीन बंटवारे के लिए मुक़दमे के सभी पक्षकारों से सुझाव मांगे गए हैं, जिसके बाद अदालत फाइनल डिक्री बनाएगी. इस बीच विवादित स्थल पर यथास्थिति बनी रहेगी.
इस बीच सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की बात भी कही है.

फ़ैसले के बाद उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है.
उनका कहना था कि विवादित 67 एकड़ ज़मीन केंद्र सरकार के क़ब्ज़े में है इसलिए इस फ़ैसले के क्रियान्यवन की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की ही है.
उनका कहना था, "इसके लिए मैने फ़ैसला आने के बाद प्रधानमंत्री को पत्र लिख दिया है."

'विजय या पराजय के रूप में न देखें'

फ़ैसले के बाद इस विवाद के पहले याचिकाकर्ता, 90 साल के हाशिम अंसारी ने कहा: "मैं इस फ़ैसले का इस्तक़बाल करता हूं और इस फ़ैसले से बाबरी मस्जिद के नाम पर चल रहा राजनीतिक अखाड़ा बंद होगा."
फ़ैसले पर मायूस होने की ज़रूरत नहीं है और सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं है. दो जजों ने माना है कि वहां मस्जिद थी लेकिन उसके बनने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं और इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे
ज़फ़रयाब जीलानी, वक्फ़ बोर्ड के वकील
उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने फ़ैसले का स्वागत किया लेकिन साथ ही कहा कि अगर ज़मीन का बंटवारा नहीं होता तो अच्छा होता.
उनका कहना था, "मेरे अनुसार अदालत ने ये ज़मीन मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड को दान में दिया है."
फ़ैसले के दिन लखनऊ की तस्वीरें
वहीं मुस्लिम वक्फ़ बोर्ड के वकील जफ़रयाब जिलानी ने कहा है कि वो इस फ़ैसले से "कुछ हद तक निराश हैं". उन्होंने कहा कि फ़ैसले का अच्छी तरह से अध्ययन करने के बाद वो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे.
उनका कहना था, "फ़ैसले पर मायूस होने की ज़रूरत नहीं है और सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं है. दो जजों ने माना है कि वहां मस्जिद थी लेकिन उसके बनने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं और इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे."
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने कहा है कि इस फ़ैसले को किसी के विजय या पराजय के रुप में नहीं देखा जाना चाहिए.
उनका कहना है कि अब राष्ट्रीय मूल्यों के प्रतीक के रुप में राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए न कि किसी देवी-देवता के प्रतीक के रुप में.
विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया का कहना है कि देश के सौ करोड़ हिंदुओं की श्रद्धा रही है और इस फ़ैसले से इस श्रद्धा का सम्मान हुआ है.
अयोध्या फ़ैसले पर बीजेपी की प्रतिक्रिया
जबकि विश्व हिंदू परिषद के ही एक अन्य नेता गिरिराज किशोर ने कहा है कि अब मुसलमानों को गुड-विल का परिचय देते हुए मथुरा और काशी को भी हिंदुओं को सौंप देना चाहिए.

शांति की अपील

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी चिदंबरम ने सभी पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

सुरक्षा व्यवस्था भी काफ़ी कड़ी रखी गई है. ये फ़ैसला पहले 24 सितंबर को आना था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रोकने के लिए दाखिल याचिका पर सुनवाई की और फ़ैसला टाल दिया. फिर 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज करते हुए फ़ैसले के लिए 30 सितंबर की तारीख़ तय कर दी.
इस मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की बेंच में से एक, धर्मवीर शर्मा, एक अक्तूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और यदि वो फ़ैसला उससे पहले नहीं सुना पाते तो पूरे मामले की सुनवाई फिर से करनी पड़ती.
अयोध्या में विवादित जमीन के मालिकाना हक के चार मामलों की सुनवाई करने वाली हाईकोर्ट की विशेष पीठ पिछले 21 साल में 13 बार बदल चुकी है.
बेंच में यह बदलाव जजों के रिटायर होने, पदोन्नति या तबादले के कारण करने पड़े.
भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में यह न केवल साठ साल तक यानि सबसे लंबा चलने वाला, बल्कि एक ऐसा विवाद है, जिसके चलते देश में कई बार राजनीतिक और सामाजिक उथल - पुथल हो चुकी है, क्योंकि यह मामला ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े नहीं बल्कि हिंदू–मुस्लिम दोनों समुदायों की धार्मिक आस्थाओं और संविधान के मूल सिद्धांतों से जुड़ा है.
अयोध्या के बाद विभिन्न समुदायों की प्रतिक्रियाएँ 

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