World Literacy Day

विश्व साक्षरता दिवस : शब्द ज्ञान और विश्व पहचान

8 सितम्बर (विश्व साक्षरता दिवस) पर विशेष

''घोर अंधकार को चीरती जब सूरज की किरणें, ''
भूतल पर अपना सतरंगी आँचल फैलाती है,
मन्दिर में घण्टे, शंखो का जयघोष अन्तर्तम के अज्ञान को मिटा
जब नवप्रभात पर नव अभिषेक कर नव प्रशस्ति का मार्ग दिखाता है,
तब पक्षी के कलरव के मिस मारूत की ठंडी श्वासों का क्रन्दन,
अज्ञान के अमावस में डूबे उस सक्षम पंगु का मखौल उड़ाता है,
विधाता की अनमोल कृति हे महामानव!
शब्द ज्ञान से हीन तू,
विश्व दर्पण में अपनी पहचान क्यों शून्य दिखाता है? - डॉ0 शुभिका सिंह
'शब्द' ब्रह्म है, 'शब्द' क्रान्ति है, 'शब्द' अस्त्र है, 'शब्द' शान्ति है, सर्वग्य शान्ति के जयघोष के साथ शब्द महिमा का गुण कथन वन्दनीय है। शब्द में वह शक्ति है जो देवासन को भी हिला सकती है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक का सम्पूर्ण वाग्ड.मय इसी शब्द - शक्ति की महिमा का साक्षात् है। मनुष्य जिसमें उस चिरन्तन बोधमयं ईश्वर का वास है वह न तो केवल बौद्धिक प्राणी है और न आहार-विहार निद्रा, भय, मैथुन से सम्बन्ध रखने वाला कोरा पशु। बुद्धि और हृदय के अनुपम समन्वय से निर्मित मनुष्य ही वास्तविक रूप में पूर्ण मनुष्य कहलाने योग्य है लेकिन जब वही मनुष्य शब्द ज्ञान के अभाव में अपनी बुद्धि और हृदय के बीच सही तालमेल नहीं बना पाता, हृदय में उत्पन्न भावों को बुद्धि की कसौटी पर कसने में जब स्वयं को असमर्थ पाता है तब उसकी अन्तर्रात्मा उसे धिक्कारती है। शब्द का ज्ञान मानव को न केवल आत्म-निर्भर बनाता है बल्कि उसके विवेक को समुन्नत कर उसे विश्व नेतृत्व की शक्ति प्रदान करता है। इस चमत्कारी अक्षर ज्ञान ने जहाँ अपने प्रकाश से प्रबुद्धों का एक ऐसा वर्ग बनाया है, जिन्होने अपनी शुभ सोच को शुभ संकल्पित प्रयासों में ढालकर विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया वहीं उस ज्ञान मार्ग पर चलने वालों की एक ऐसी पंक्ति तैयार की जो उनके द्वारा पकड़ायी गयी ज्ञान की मशाल के प्रकाश में चलकर आगे आने वाली पीढ़ी का पथ प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन जहाँ ज्ञानदीप की श्रृंखला का एक भी दीपक बुझा तो उसका घनघोर तमस सम्पूर्ण विश्व के प्रज्ञा प्रकाश पर प्रश्नचिन्ह लगा देता है।
''एक सुखी व समृद्ध समाज' के पीछे करोड़ों जनजागृत लोगों का सुप्रयास छिपा रहता है। यह प्रयास तभी शुभता की सृष्टि करता है जब विश्व का हर मानस शब्द ज्ञान के प्रकाश से आलोकित हो क्योंकि यह शब्द ज्ञान न केवल हमारी शैक्षिक पृष्ठभूमि को ऊँचा उठाता है बल्कि हमें चिन्तन के उस स्तर तक सोचने की शक्ति देता है, जिसके बलबूते हम इस वसुन्धरा पर अपने सजीव होने का बोध कराते हैं। मनुष्य को अपने सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यकता होती है सही सोच की और यह सोच उसे प्राप्त होती है सही शिक्षा से किन्तु जब यह शिक्षा उससे दूर हो जाती है तो माँ सरस्वती के वरद हस्त से निर्झर ज्ञानाशीष के अभाव में मनुष्य न तो सही दिशा तलाश पाता है और न ही अपने आश्रितों के लिये संकल्पित उत्तरदायित्वों को ही पूर्ण कर पाता है। फलतः उसका भविष्य भी उस तिमिर से मिलकर एक ऐसे घने अंधकार की सृष्टि करता है जो विश्व की प्रबुद्ध सत्ता का परिहास करता है।
जहाँ तक विश्वव्यापी परिप्रेक्ष्य में साक्षरता का प्रश्न है तो हम पायेगें कि पश्चिमी देशों की अपेक्षा इस्लामी बहुसंख्या वाले देशों में साक्षरता की स्थिति अत्यधिक गम्भीर है। हिंसक व खूनी राजतन्त्र के चलते वहाँ शिक्षा का कोप निरन्तर गहराता जा रहा है। ऐसे देशों में पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं का साक्षरता अनुपात काफी कम है। अफसोस की बात तो यह है कि यदि इस क्षेत्र में कोई साहसी कदम उठाया भी जाता है तो प्रशासन द्वारा उसे बड़ी निर्ममता से कुचल दिया जाता है। इसके पीछे मानसिकता शायद यही रहती हैं कि जनता जितनी अधिक शिक्षित व प्रबुद्ध होगी वह प्रशासन की बारीकियों व अपने हित-अहित को उतना ही अधिक समझेंगे।
यदि विश्व में साक्षरता की स्थिति देखे तो अफगानिस्तान, इराक, इथियोपिया, नाइजर, गिनी, गिनी-बिसाऊ, गैम्बिया, चाड, नेपाल, पाकिस्तान, बरकिना, फासो, बांग्लादेश, बेनिन,भूटान, मोजाम्बिक, माली, मौरितानिया, सियरालियोन, सेनेगल, सोमालिया में साक्षरता 50% से भी कम है। जिनमें अफगानिस्तान, इराक, नाइजर, बेनिन, सियरालियोन, सोमालिया में साक्षरता की स्थिति अत्यन्त शोचनीय है। जबकि यूरोप व अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्रों में पुरूषों व महिलाओं की साक्षरता सन्तोषजनक है। पश्चिमी देशों की उन्नति के पीछे कारण उनका शिक्षित एवं जागरूक समाज है। आइस्लैण्ड, आयरलैण्ड, आस्ट्रेलिया, उक्रेन, उज्बेकिस्तान, एस्ओनिया, अण्डोरा, कनाडा, उत्तरी-कोरिया, चेक गणराज्य, जर्मनी, जापान, जार्जिया, डेनमार्क, ताजिकिस्तान, न्यूजीलैण्ड, नार्वे, नीदरलैण्ड, फ्रांस, पोलैण्ड, फिनलैण्ड, बेलारूस, बेल्जियम, यूनाइटेड किंगडम, रूस, लेक्जमवर्ग, लिशुआनिया, लात्विया, समोआ, स्लोवेनिया, स्लोवाकिया, स्विट्जरलैण्ड, हंगरी, आदि देशों में शत-प्रतिशत साक्षरता देखने को मिलती है। किसी भी देश का शान्त व सफल राजनीतिक व सामाजिक वातावरण उस देश के चहुमुखी विकास के लिए आवश्यक है। पश्चिमी देशों की उन्नति के पीछे एक मूल रहस्य यह है कि वहां महिलाएं व पुरूष आपस में कंधे से कन्धा मिलाकर देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान देते है। यह स्थिति तब और भी साफ हो जाती है जब हम अर्जेन्टाइना जैसे देश को देखे जहाँ गिरती आर्थिक स्थिति, मंदी औरं विदेशी कर्जे के बढ़ते बोझ के बावजूद साक्षरता 97% है। वहीं दूसरी ओर मध्य एशिया का अफगानिस्तान गणराज्य हैं जहाँ साक्षरता मात्र 36% है क्योंकि वहाँ के हिंसक व आतंकी राजनीतिक माहौल है के चलते सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था चरमरायी हुई है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो इसे विश्व का सबसे अविकसित देश घोषित कर दिया है। संसार के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में पाँचवा स्थान रखने वाला इराक जो कि संसार के सर्वाधिक प्राचीन देशों में एक है, की साक्षरता मात्र 40% है। केवल शैक्षिक व सांस्कृतिक ही नहीं, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक सभी क्षेत्रों में इराक की स्थिति चिन्ताजनक है। राजशाही शासन व लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था के भीषण द्वंद के चलते माओवादियों के आतंक से ग्रस्त नेपाल में भी साक्षरता (48.6%) की स्थिति संतोषजनक नहीं है। उर्दू, सिंधी, बलूची, पंजाबी आदि भाषाओं से अलंकृत पाकिस्तान में महिला साक्षरता की स्थिति काफी दयनीय है।
भारत जो कि अपनी सभ्यता, संस्कृति व धर्मनिरपेक्ष सेाच के कारण विश्व में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है, उस देश की 45% जनता के लिए आज भी 'काला अक्षर भैंस बराबर' है। आज भारत की जनसंख्या एक अरब की सीमा को पार करके विश्व में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। एक मार्च 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1027,015,247 थी। भारत की लगभग आधी आबादी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिमी बंगाल व आन्ध्र प्रदेश में रहती है। उत्तर प्रदेश की आबादी देश की कुल आबादी का 16.17% है, जो सर्वाधिक है। 9.42% आबादी के साथ महाराष्ट्र दूसरे तथा 8.07% के साथ बिहार तीसरे स्थान पर है।
जनगणना आंकड़े पर एक झलक

जनसंख्या व्यक्ति
पुरूष
महिलायें
1027,0152,47
531,277,078
495,738,169
दशकीय जनसंख्या कुल प्रतिशत
वृद्धि-1991-2001
व्यक्ति
पुरूष
महिलायें

180,627,359
91,944,020
88,683,339

21.34%
20.93%
21.79%
साक्षर कुल जनसंख्या का प्रतिशत

व्यक्ति
पुरूष
महिलायें
566,714,995,
339,969,048
226,745,947
65.38%
75.85%
54.16%

यदि जनगणना के आंकड़े पर एक झलक डाले तो हम पायेंगे कि,1981-1991 के दशक में भारत की साक्षरता-दर 52.21% थी। जो 1991-2001 में बढ़कर 65.38% (पुरूष 75% व महिलाएं 54%) हो गयी तात्पर्य यह है कि पुरूषों की तीन चौथाई और महिलाओं की आधी आबादी साक्षर है। 1981-1991 तथा 1991-2001 में पुरूष व महिलाओं के साक्षरता अनुपात में 28.84 से 21.70% की गिरावट दर्ज की गयी है। केरल में जनसंख्या नियन्त्रण एवं साक्षरता ने अपना प्रभुत्व बनाये रखा। यहाँ वार्षिक दर गिरकर 0.90% पर आ गयी जो कि यहाँ की राष्ट्रीय वृद्धि दर 1.93% की तुलना में बहुत कम है। तमिलनाडु 1.06% के साथ दूसरे स्थान पर तथा आन्ध्र प्रदेश 1.30% की वृद्धि दर लेकर तीसरे स्थान पर है। केरल में साक्षरता दर जहाँ 90.92% है वहीं बिहार में साक्षरता दर 47.53% है जो कि केरल की तुलना में बहुत कम है। एक ही देश में एक सी नियम व्यवस्था लागू होने के बावजूद परस्पर राज्यों के आँकडों के बीच इतने अधिक उतार-चढ़ाव के मूल कारण को समझते हुए केन्द्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि वह परस्पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति को त्यागकर साक्षरता की स्थिति को सुदृढ़ बनाने के लिए सराहनीय कदम उठाए।
1991-2001 के दशक में हालाकि साक्षरों की संख्या में वृद्धि हुई बावजूद इसके भारत अभी भी साक्षरता की दृष्टि से अति पिछड़ा देश है। दक्षिण भारत के प्रान्तों का प्रदर्शन पूर्व जनगणना के अनुरूप इस बार भी बेहतर रहा। दक्षिण भारत के चार प्रान्तों मे सर्वाधिक जनसंख्या वाला प्रान्त आन्ध्र प्रदेश में जनसंख्या वृद्धि दर में तो कमी हुई परन्तु निरक्षरों की बढ़ती स्थिति को देखते हुए वह उत्तर प्रदेश व बिहार के पश्चात् तीसरा प्रान्त है उत्तरी भारत के प्रान्तों में जनसंख्या व साक्षरता दर की स्थिति गम्भीर है। चार प्रमुख हिन्दी भाषी प्रदेशों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अकेला राजस्थान ही एक ऐसा प्रदेश है जहाँ पुरूषों की साक्षरता दर मे बेहतर वृद्धि हुई है। इस दृष्टि से मध्य-प्रदेश का दूसरा स्थान है। छत्तीसगढ़ में महिला साक्षरता में 24.87% की बृद्धि हुई है। उत्तरांचल और उड़ीसा में पुरूष-महिला साक्षरता में वृद्धि हुई। केवल दादरा और नगर हवेली को छोड़कर लगभग सभी प्रान्तों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में महिला साक्षरता में वृद्धि हुई है। हालांकि स्वतंत्रता के पश्चात् पहली बार निरक्षरों में भारी गिरावट आयी है किन्तु जब हम एक भी मनुष्य के निरक्षर न रहने की बात कहते है तब वहाँ यह आकड़े बेईमानी से लगने लगते है। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो यह तथ्य भी सत्य है कि सरकार द्वारा सुनियोजित विकास की पंचवर्षीय योजनओं में साक्षरता को विशेष महत्व दिए जाने तथा करोड़ों रूपया पानी की तरह बहाए जाने के बावजूद यह समस्या अभी भी पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है। सन् 1937 में राष्ट्रीय आन्दोलन के फलस्वरूप चला यह प्रयास आज भी सतत् प्रवहमान हैं। ऐसे में साम्यवादी भावना व आदर्शो को लेकर निराला की 'जल्द-जल्द' पैर बढ़ाओं' कविता दिशाहीन राष्ट्रों के लिए ज्ञान की प्रखर ज्योति दीप्तिमान करती है
'आज अमीरों की हवेली'
किसानों की होगी पाठशाला
धोबी, पासी, चमार, तेली
खोलेगे अंधेरे का ताला
एक पाठ पढ़ेंगे टाट बिछाओ।'
'अब्राहम लिंकन' ने स्त्री की शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हुए कहा था कि 'शिक्षित माँ ही स्वस्थ समाज की नींव है।' यह काफी दुःखद तथ्य है कि साक्षरता मिशन पर भारत सरकार के निरन्तर प्रयास के बावजूद दुनिया के सबसे ज्यादा अनपढ़ लोगों में से 1/3 भारत में हैं। जिनमें महिलाओं का प्रतिशत सबसे अधिक है। यही स्थिति मध्य एशिया के अन्य देशों की भी है। जब हम यूरोप व अमेरिका की नकल कर राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी आदि सभी क्षेत्रों में आगे निकलने की होड़ में विकास के घोड़े दौड़ा रहे हैं तो ऐसे में साक्षरता जैसे मुद्दे पर अटकना हमें अपनी नीतियों और अभियानों पर पुनर्विचार के लिए विवश करता है। 'शिक्षा सशक्तिकरण' की बुनियादी आवश्यकता 'विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा से सम्बन्धित है क्यांेकि 'एक शिक्षित माँ एक शिक्षित परिवार की जननी है और एक शिक्षित परिवार शिक्षित समाज की नींव है।' साक्षरता दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के भाषण में भी महिला साक्षरता की हीन दशा पर असन्तोष स्पष्ट था। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि महिला साक्षरता जैसा महत्वपूर्ण मुद्दा आज तक किसी भी देश की राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय एजेंडे में मुख्य विषय के रूप में शामिल नहीं है। ऐसे में हम 'नारी' सशक्तिकरण' का नारा देकर किसे गुमराह कर रहे हैं। कट्टरपंथियोें को भी अपनी संकीर्ण मानसिकता का त्याग कर स्त्रियों को शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराकर उन्हें चहुमुखी विकास का अवसर प्रदान करना चाहिए। महिलाओं को भी यह बात समझनी चाहिए कि शिक्षा के अभाव के कारण ही उन्हें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक हर प्रकार की प्रताड़नाओं को सहना पड़ता है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछ़ड़ी जाति के क्षेत्रों में भी साक्षरता दर काफी कम है। हमें धर्म, जाति व लिंग के बन्धनों को तोड़कर शिक्षा को सर्व सुलभ बनाना चाहिए।

वैश्विक उन्नति पर नजर डाले तो एक ओर विश्व में बड़े-बडे़ प्रबन्ध संस्थान, शैक्षिक संस्थान, इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेज हैं, नक्षत्रशालाएं हैं, यहीं नहीं धरती से लेकर आसमान तक सर्वत्र तकनीकी अनुसंधान का जाल फैला है वहीं दूसरी ओर एक बड़ा वर्ग साक्षरता जैसे मुद्दों पर उलझा है। एक दिन विशेष को 8 सितम्बर को 'विश्व साक्षरता दिवस' घोषित करके सरकारी आंकड़ों द्वारा औपचारिक चिन्ताओं को प्रदर्शित करने मात्र से काम नहीं चलेगा। बेहतर यह होगा कि यदि सरकारें अपने प्रयासों व व्यय के आँकड़े प्रस्तुत करने के स्थान पर संस्थानों व उनकी नीतियों के परिणामों के बारे में बताएं। संख्यात्मक प्रयास के बजाय गुणात्मक प्रयासों का ब्यौरा दें। 20-22 वर्षों के सुगठित व सुनियोजित प्रयास के बावजूद विश्व के करोड़ों प्रौढ़ आज भी निरक्षर हैं। साक्षरता के अभाव में वह शताब्दियों पुरानी रूढ़ियों से ग्रस्त हैं। पुस्तकालय, वाचनालय, रेडियो, चित्र-प्रदर्शन, टेलीविजन, कम्प्यूटर आदि आधुनिक संसाधनों के लाभों से सर्वथा वंचित है। अपने व्यवसाय को पुराने ढंग से चलाने के लिए बाध्य वह बड़ी मुश्किल से अपनी रोजीरोटी चला रहे हैं। पंचायत भी सरकारी संगठनों को नेताओं, सरकारी अधिकारियों तथा सम्पन्न लोगों का षडयन्त्र मानती है। देश-विदेश की गतिविधियों से दूर करोड़ों प्रौढ़ नर-नारी आज भी इस सच्चाई से अनभिज्ञ हैं कि वह स्वतन्त्र राष्ट्र में सांस ले रहे हैं। जिसमें सबसे ज्यादा हीन दशा औरतों की है।
बदलते समय के साथ समाज में फैली स्वार्थपरक मानसिकता, दिशाहीन राजनीति, उदारवाद की आँधी, मीडिया व सूचना तन्त्रेां के निरन्तर बढ़ते प्रभाव से हमारे चरित्र व व्यवहार में जो खुलापन आया है उसके फलस्वरूप लोगों में नैतिक मूल्यों का हृास हुआ है। शिक्षा का उद्देश्य मात्र सम्प्रेषण न होकर लोगों की आवश्यकता पूर्ति की क्षमता से युक्त होना चाहिए। उदारीकरण व भूमण्डलीकरण के इस दौर में अक्षर-ज्ञान भावी समाज की पुनर्रचना में संजीवनी औषधि का काम कर रहा है। रोजगार की तलाश में ग्रामीण व आदिवासी लोग अपनी पहचान बनाए रखने के सशक्त प्रयास में गावों से शहरों की ओर प्रयाण करते जा रहे हैं। फलतः जहाँ एक ओर गाँव के गाँव पिछड़ते जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर शहरों के आधुनिक वातावरण में ग्रामीण व अनपढ़ लोग अपने आपको व्यवस्थित रूप से ढाल भी नहीं पा रहे हैं। आज विश्व में टकराव और तनाव की भीषणता से निपटने के लिए समाज शिक्षा की आवश्यकता और भी अधिक महनीय हो गयी है। समय की माँग के अनुसार नव साक्षरों के पाठ्यक्रम में 'अन्तर्राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति' के अन्तर्गत शान्ति सम्बन्धी शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाना चाहिए।
ज्ञान प्राप्त करके साक्षर न केवल अपने शोषण के प्रति जागरूक होंगे बल्कि अपने नजरिए से विश्व को पहचानेंगे। विज्ञान व प्रौद्योगिकी के नवीन अविष्कारों व सूचनाओं का लाभ उठा सकेंग। शब्द ज्ञान द्वारा मनुष्य नित्य नवीन सूचनाओं का लाभ उठाकर उसी के अनुरूप अपनी क्षमता को बढ़ाने का प्रयास करेंगे। वे परिवार नियोजन, सर्वशिक्षा अभियान, बेसिक शिक्षा, पल्स पोलियो अभियान, संक्रामक रोगों से बचाव, सरकारी बचत योजना, लोकतन्त्र व निष्पक्ष मतदान की महिमा को समझंेगे तथा अपने मूलभूत अधिकारों व कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक होगें। जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, बाल अपराध, बाल मजदूरी, नारी व यौन शौषण, मजदूरों व कृषकों द्वारा बढ़ती आत्महत्या सम्बन्धी अपराध के साथ अनैतिकता, हिंसा, नशाखोरी, अनुशासनहीनता जैसी कुप्रवृत्तियाँ भी समाप्त होगीं। अक्षर-ज्ञान के हथियार द्वारा व्यक्ति स्वयं ही सही गलत का फैसला करके 'सत्यमेव जयते' को सिद्ध कर सकते हैं। सरकारें हालांकि बच्चों, बालिकाओं, वृद्धों कृषकों, मजदूरों, महिलाओं, प्रौढ़ों, निरक्षरों व निर्धनों के कल्याणार्थ अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन करती है किन्तु जातिवादिता व दलगत राजनीति के चलते वह सिसक-सिसक कर बीच में ही अपना दम तोड़ देती हैं और महज कागजी खानापूर्ति मात्र बनकर रह जाती है। देखा जाए तो विगत कुछ वर्षों से सरकार द्वारा इस अभियान की सफलता के लिए नई-नई योजनाएं बनायी जा रहीं है, इस दिशा में अनेक अनेक परिवर्तन एवं परिवर्द्धन किए जा रहे हैं। प्रारम्भ में प्रौढ़ शिक्षा का साधन रात्रि पाठशालाएँ, पुस्तकालय, प्रौढ़ साहित्य प्रकाशन आदि तक ही सीमित था किन्तु अब जीवन का अनिवार्य अंग होने के कारण वह न केवल हर देश के शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी हैं अपितु विश्व परिवार के उन्नतिशील सामुदायिक कृषि, सहकारिता, पंचायतराज, समाज-कल्याण, स्वास्थ्य, पशुपालन एवं अन्य विकास योजनाओं का एक सकल उत्तरदायित्व बन गई है। आज जरूरत है तो गाँव-गाँव और घर-घर में 'अशिक्षा का नाश हो', 'अंगूठा लगाना पाप है', 'हर एक-एक को पढ़ाए', 'साक्षर बनो' की शब्द क्रान्ति की गूँज से विश्व को व्याप्त करने की। निःशुल्क साक्षरता कार्यक्रम के अतिरिक्त प्रौढ़ांे की रूचनानुसार रोचक व मनोरंजक साहित्य का सृजन किया जाए। नवसाक्षरों के लिए साहित्य की भाषा उन्हीं के परिवेश से जुड़ी लोकभाषा होनी चाहिए। जिसको पढ़ने-सुनने में वे रूचि दिखाएं। अब इस मिशन का उद्देश्य प्रौढ़ों को मात्र अक्षर ज्ञान करा देना नहीं है बल्कि इस अभियान ने सम्पूर्ण सामुदायिक जीवन को समुन्नत करने के सामुदायिक प्रयास का सर्वव्यापी रूप ग्रहण कर लिया है। प्रौढ़ों की विविध आवश्यकताओं, स्वास्थ्य, मनोरंजन, गृहस्थी व आर्थिक जीवन को संस्कारित करने का प्रयास भी आन्दोलन का अभिन्न अंग बन गया है। समाज-शिक्षा केा प्रभावी बनाते हुए उन्हें अक्षर-ज्ञान के साथ ही अपने आस-पास के परिवेश को साफ-सुथरा रखने, अपने अवकाश के क्षणों का सदुपयोग करने, बच्चों के लिए शिक्षा का महत्त्व व्यक्तिगत स्वच्छता व स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी के साथ सहकारिता की भावना से कार्य करने तथा स्वतन्त्र देश के योग्य एवं सक्षम नागरिक बनकर देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों केा पूरा करने की शिक्षा दी जाती है। पिछले कुछ वर्षों में सामुदायिक केन्द्रों, वाचनालयों आदि के अतिरिक्त सांस्कृतिक उत्सव, फिल्म, प्रदर्शनी, नाटक, कठपुतली, नौटंकी, के आयोजन, युवक मंडलियों एवं महिला मंडलों के गठन, नवीन, प्रौढ़ साहित्य की रचना ने साक्षरता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत में पचंवर्षीय योजनाओं में साक्षरता कार्यक्रम के विस्तार के लिए उद्योगपतियों, राष्ट्रीय सेवा योजना के पंजीकृत विद्यार्थियों और समाज सेवी संस्थाओं से सहायता लेकर उसके परिणामों में परिशोधन का प्रयास किया जा रहा है। जिसका आर्थिक अनुदान और प्राविधिक मार्गदर्शन सरकार की ओर से होगा। ग्रामीणों को कृषक शिक्षा व व्यवहारिक शिक्षा के साथ प्रौढ़ शिक्षा के लिए विज्ञता प्रदान की जा रही है। विश्वविद्यालय के प्रौढ़ शिक्षा विभागों को अग्रगामी योजनाओं के क्रियान्वन, शोधकार्य करने तथा विस्तार भाषण-माला के आयोजन के लिए सरकारी आर्थिक सहायता में बढ़ोत्तरी की गई है। साथ ही उपग्रह संचार व्यवस्था का लाभ उठाकर कम साक्षरता वाले क्षेत्रों में विशेष कम्प्यूटर आधारित त्वरित साक्षरता कार्य शुरू किए जा रहे हैं। बुद्धिजीवी वर्ग को चाहिए कि वह चैतन्य विश्व के निर्माण में 'हारिए न हिम्मत, करिए प्रयास़' के मूलमंत्र को अपनाकर अशिक्षा के अंधकार को मिटाने के लिए ज्ञान के इस महायज्ञ में अपने प्रयासों की समिधा से निरक्षता उन्मूलन के व्रत को सफल बनाए। उच्च्स्थ लोगों को 'शिक्षा एवं साक्षरता विभाग' व 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय' के साथ मिलकर सम्पूर्ण विभेद को मिटाकर इस समस्या को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। देश व समाज की नींव से जुड़े मुद्दों पर तो सम्पूर्ण विश्व के देशों को एक जुट होकर ठोस कदम उठाने चाहिए। इस विश्वास के साथ कि एक दिन ज्ञान का सवेरा अवश्य होगा और भाल विजय पर कुंकुम की लाली चमकेगी। दलित पीड़ित जन ही 'नयी ऋचाओं का निर्माता होगा, सबका नायक होगा'।
आइये, 'असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय' ब्रह्मवाक्य के शुभ संकल्प के साथ नव प्रभात बेला में कदम रखने वाले विश्व के आंगन से इस अभिशाप को जड़ से मिटाकर अपने बुद्धिजीवी होने का परिचय दें।

                                            साभार :  डॉ0 शुभिका सिंह
                                             प्रवक्ता (हिन्दी विभाग)

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