पते की बात

।। संजोग या भविष्य ।। 
इस बात को बहुत साल नहीं हुए। लेकिन उस समय यातायात के वैसे साधन नहीं थे, जैसे कि आजकल हैं। उसी दौरान की बात है, एक राहगीर ने गांव के एक वृद्ध से आगे की राह पूछी। वृद्ध ने अपने गांव की परम्परा के मुताबिक पहले तो राहगीर का आदर-सत्कार किया और फिर आगे की राह बताई।

वह राहगीर बेहद प्रसन्न हुआ। उसने कहा - ‘बाबा, मैं प्रकांड ज्ञानी हूं, भूत-भविष्य और काल योग देखना मेरा पेशा है। मैं आपकी मेहमाननवाज़ी से बहुत अभिभूत हूं, आप चाहें, तो मैं आपका भविष्य बता सकता हूं।’

वृद्ध ने कहा -‘मेरी उम्र तो जीवन के अंतिम पड़ाव पर है। मेरा अब क्या भविष्य जानना, बेहतर होगा अगर आप मेरे बच्चे का भविष्य बता दें। वह मेरा पोता है, जो एवड़ चरा रहा है। बहुत छोटा है अभी, पर मैं उसके कल को लेकर चिंतित हूं। मैं चाहता हूं कि यह पढ़-लिख जाए और नौकरी करे। देखिए, इसके जीवन में तो धन-सुख है न?’

भविष्यवेत्ता ने बच्चे का हाथ और माथे की लकीरें देखकर कहा - ‘बाबा, इस लड़के का कोई भविष्य नहीं है। इसके गुरु में शनि बैठा है और बुध अस्त है- न शिक्षा का योग है और न धन का। इसके जीवन में न मन की शांति रहेगी और न ही सेहत।’ बाबा निराश हो गए। माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। राहगीर ने चलने की आज्ञा ली और अपनी राह चल पड़ा।

कुछ ही क्षणों में एक ज़ोर की आवाज़ आई और फिर किसी की चीख सुनाई दी। बच्च और बाबा दोनों उस दिशा की तरफ भागे। राहगीर समीप के बिना मुंडेर वाले सूखे कुएं में गिर गया था। दोनों ने बड़े प्रयत्नों से उसे बाहर निकाला।

राहगीर ने अपने झेंप मिटाने के लिए कहा - ‘मैं तो आकाश में नक्षत्रों की दिशा देखते हुए, पहचानने की कोशिश कर रहा था, ध्यान नहीं रहा और कुंए में गिर गया। अच्छा ही हुआ कि आप लोग समीप थे, आपने आकर मेरा जीवन बचा लिया।’
वृद्ध ने कहा - ‘यह तो और भी अच्छा हुआ कि आप मेरी आंखों के सामने कुं ए में गिरे अन्यथा मैं जो जीवन-भर के लिए संशय के कुंए में गिर जाता। हो सकता है कि अपने बच्चे को जीवन-भर दुर्भाग्यशाली मानता रहता। अब मैंने देख लिया कि अगले ही पल क्या होने वाला है, आप यह तक नहीं जान सकते, तो दूर के भविष्य के बारे में कैसे कुछ कह सकते हैं।’ भूत, भविष्य और काल योग से अज्ञात समीप ही खड़ा बच्च मुस्कुरा रहा था। -  साभार : रामानंद काबरा. जोधपुर. राजस्थान

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