अहं

 ।।अहं को छोड़ कर सत्य से नाता जोड़ें।।

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व्यक्ति के जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब वह सभी तरह की सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण और वैभव-विलासिताओं से अपने आप को घिरा पाता है।
तब यदि उसे अपना बीता हुआ कल या संघर्ष याद रहता है तो वह अपना जीवन, सादा जीवन-उच्च विचार की तर्ज पर ही बिताता है पर अकसर देखा गया है कि वैभव या अधिक सुख व्यक्ति में अहम पैदा कर देता है।

एक वैज्ञानिक था। उसने अपने पूरे जीवन को एक अहम खोज के लिए समर्पित कर दिया था। उसकी खोज थी अपनी ही शक्ल और हाव-भाव का एक और निर्जीव प्राणी बनाना।
एक दिन उसका यह आविष्कार भी पूरा हो गया। लेकिन दैव-योग से उसे यह आभास हुआ कि वह अब ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह सकता।

लेकिन वह मरना नहीं चाहता था। उसने अपनी शक्ल के दस पुतले बनाये और निश्चित दिन वह उनके साथ मिलकर खड़ा हो गया। यमदूत आये और एक ही चेहरे के ग्यारह लोगों को देखकर असमंझज में पड़ गये। काफी देर रुकने के बाद वे वापस चले गए और धर्मदेव को सब बातें कह सुनाई।

सब बातें सुनकर धर्मराज खुद वहां आये और आते ही सब माजरा समझ गए। उन्होंने कहा- यद्यपि सभी पुतले काफी बढिय़ा और एक जैसे हैं पर लगता है जैसे कहीं कोई कमी रह गई हो।
इतना सुनते ही वह वैज्ञानिक सामने आ गया और अहंकार में भर कर बोला कि बताईए कहां और किस पुतले में कमी रह गई है। धर्मराज ने तुरंत उसे अपने पाश में जकड़ते हुए कहा कि इसी में कमी रह गई थी जो आज पूरी हो गई।

कहानी का सार यही है कि पद, वैभव, विलासिता और सुख की अधिकता के कारण व्यक्ति को अपना कल यानि मृत्यु नहीं भूलना चाहिए। खासकर अहं को तो अपने जीवन से हटा ही देना चाहिए। आखिर अहम हो भी तो किसका ?

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