इस शिक्षा से समाधान नहीं


इस शिक्षा से समाधान नहीं


                                                                        
"भारत जैसे देश में रोजगार को शिक्षा का अतिरिक्त उत्पाद होना चाहिए था, लेकिन प्रबोधन शिक्षा का अतिरिक्त उत्पाद हो गया और जैसे-जैसे प्रबोधन की स्मृति धूमिल होती गई, शिक्षा के आधारभूत ढांचे से ज्ञान और प्रबोधन का तत्व भी धुंधला होता गया। उसकी जगह अधिक स्वार्थ लोलुपता, चालाकी, अंधी प्रतियोगिता और आर्थिक सफलता की इच्छा ने ले ली।"


शिक्षा और युवावर्ग के पारस्परिक संबंध को रोजगार एक सामाजिक आधार प्रदान करता है। इसलिए रोजागर की अधिकाधिक संभावनाओं वाली शिक्षा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में शैक्षणिक गुणवत्ता और नैतिक मूल्यों के स्थान पर काबिज हुई है। इसका इतिहास लगभग दो सौ वर्ष पुराना है यानी इसके सूत्र औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजों की देख-रेख में हो रहे शैक्षणिक ढांचे में हुए बदलाव तक फैले हैं। अपनी समस्त शैक्षणिक तैयारियों, जिसमें ज्ञान, मेधा, डिग्री, प्रमाण-पत्र और अनुभव शामिल हैं, के साथ युवा जब सामाजिक ढांचे में प्रत्यक्ष भूमिका के लिए तैयार होता है तो जो तत्व उसे वैध-अवैध, जरूरी-गैरजरूरी करार देता है, वह है, उसका रोजगार या उसकी संभावना। औपनिवेशिक दौर की आधुनिक शिक्षा से पूर्व तक शिक्षा एक वर्ग-विशेष तक सीमित थी और उसका उद्देश्य भी अपने पारंपरिक क्षेत्रों में दक्षता प्रदान करना था। औपनिवेशिक दौर की आधुनिक शिक्षा ने उसे चोट जरूर पहुंचाई लेकिन उसे पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया, जो उसका उद्देश्य था भी नहीं। उसका मूल उद्देश्य औपनिवेशिक ढांचे को सुचारू रूप से चलाने के लिए सस्ते मानव-उपकरण तैयार करना था इसलिए सामाजिक जागरूकता या नैतिक दायित्व जैसे प्रश्नों पर विचार ही नहीं किया गया। साथ ही शिक्षा के जरिये विशेषीकृत लोगों की एक ऐसी जमात तैयार की गई जो कुशल श्रम, सेवा क्षेत्र या उससे जुड़ने की संभावना के आधार पर सामान्य लोगों से अलग हो गई। औपनिवेशिक दौर में रोजगार की जो नई संभावनाएं पैदा हुई थी, शिक्षण नीति को बदल कर उसके हित-पोषण में लगाया गया। इसलिए शिक्षा और रोजगार में मजबूत और अनिवार्य संबंध स्थापित हो गया, जो आज और भी अधिक दृढ़ और स्थायी हो चुका है।
भारत जैसे देश में रोजगार को शिक्षा का अतिरिक्त उत्पाद होना चाहिए था, लेकिन प्रबोधन शिक्षा का अतिरिक्त उत्पाद हो गया और जैसे-जैसे प्रबोधन की स्मृति धूमिल होती गई, शिक्षा के आधारभूत ढांचे से ज्ञान और प्रबोधन का तत्व भी धुंधला होता गया। उसकी जगह अधिक स्वार्थ लोलुपता, चालाकी, अंधी प्रतियोगिता और आर्थिक सफलता की इच्छा ने ले ली। पिछले किसी भी दौर से तुलना करें तो पायेंगे कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने वर्ग-विभाजन को पहले के बनिस्पत अधिक गहरा किया है। साथ ही, वर्ग-विभाजन के उपरान्त पैदा होने वाले असंतोषों के शमन के लिए रोजगार की संभावनाओं का इस्तेमाल ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह किया है। उसी तरह जैसे पहले सामाजिक असंतोषों के शमन के लिए धर्म और ईश्वर को ‘सेफ्टी वाल्व’ के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। इसलिए केवल स्कूल और कालेज यानी शैक्षणिक संस्थान ही बटें नहीं हैं बल्कि शिक्षा का भी खौफनाक बंटवारा हुआ है। एक ओर यदि विज्ञान- प्रौद्योगिकी और प्रबंधन आधारित व्यावसायिक शिक्षा है जिसे भूमंडलीय-बाजारवादी व्यवस्था ने अनंत संभावनाओं से भर दिया है तो दूसरी ओर पारंपरिक मानविकी शिक्षा है।
आजादी के बाद शिक्षा को राज्य के अधीन इस उद्देश्य के साथ किया गया कि इसमें क्षेत्रीय विशिष्टताओं और मांग के अनुरूप ठोस एवं व्यावहारिक नीतियां बनाई जा सके। इसलिए ‘शिक्षा की भारतीय प्रणाली’ अपने पारिभाषिक रूप में कोई केन्द्रीयकृत इकाई नहीं है। बावजूद इसके रोजगार की संभावना और सुरक्षा इसे केन्द्रीय रूप प्रदान करती है। बच्चा जब स्कूल में भर्ती होता है तो वहां से लेकर उच्च शिक्षा तक, जितने भी लोग इस दौड़ में बचे रहते हैं, खौफनाक रूप से वर्गीकृत हैं। संकाय, भाषा, संस्थान, पैसा, शहर और देश इसके वर्गीकरण को आधार प्रदान करते हैं। इन तमाम आधारों को वैधता प्रदान करने का काम रोजगार करता है। इसके कारण ‘शिक्षित युवा’ कहने से बहुत खींचतान कर भी कोई समान या एकरूप परिभाषा नहीं बनाई जा सकती। गांवों-कस्बों में खुलने वाले कालेज और शहरों में स्थापित कालेजों में ढांचागत अंतर बहुत अधिक है जो समान डिग्री के बावजूद गुणवत्ताा को आसानी से प्रभावित करता है। शिक्षा की माध्यम भाषा तो मौजूदा दौर में रोजगार की संभावना को सीधे-सीधे बांट देती है।
औपनिवेशिक भारत की शिक्षण नीति और आजाद भारत में उसके किंचित सुधरे रूप ने रोजगार को नौकरी तक सीमित कर दिया है। शिक्षण व्यवस्था के द्वारा उत्पादित विद्यार्थी कुशल मजदूरी-पर्यवेक्षक या अर्थ-व्यवस्था के तीसरे क्षेत्र अर्थात् सेवा क्षेत्र के लिए तैयार माल की तरह शैक्षणिक संस्थाओं से निकलते हैं। उक्त क्षेत्र यदि इस तैयार माल का उपयोग नहीं कर पाते तो रोजगार या जीविकोपार्जन के लिए वे जो भी रास्ता चुनते हैं उसमें अर्जित शिक्षा की भूमिका नगण्य होती है। यदि व्यापक तौर पर एक सर्वेक्षण किया जाए कि नौकरी न मिलने के बाद युवाओं द्वारा चुनी गई आजीविका में उनकी शिक्षा मददगार हुई या नहीं तो इसके नतीजे भयंकर रूप से निराशाजनक होंगे। इस तरह हम देख सकते हैं कि भारत में युवाओं की संख्या और नौकरी की उपलब्धता को देखते हुए शिक्षा ने न तो रोजगार के प्रति कोई विश्वास पैदा किया है और न ही वह नैतिक-सामाजिक- राजनीतिक मूल्यों के विकास की दिशा में कोई सकारात्मक पहल कर पायी है। इसकी जगह उसने गलाकाट प्रतियोगिता की दिशा में आक्रामक बन जाने के लिए युवाओं को उकसाया है।
प्रबंधन और प्रौद्योगिकी आधारित शिक्षा ने युवाओं की रोजगार संभावनाओं को पुष्ट जरूर किया है, लेकिन इसका एक बड़ा नुकसान यह हुआ कि इसने शिक्षितों के नाम पर चालाक और धूर्त लोगों की जमात खड़ी की, जिसका सीधा संबंध भूमंडलीकृत व्यवस्था से है। भूमंडलीय बाजार के एकाधिकार के पूर्व के दौर में जब लघु दस्तकारी और छोटे उद्योगों के संरक्षण की सरकारी नीतियां प्रभावी थीं, तब सीमित मात्रा में ही सही, ऐसी शिक्षा जो रोजगार से सीधे जुड़ी थीं जैसे आई.टी.आई. या व्यावसायिक डिप्लोमा पाठयक्रम, उसके प्रति मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्गीय छात्रों का झुकाव था और इसमें एक सम्मान जनक जीवन जीने की पर्याप्त संभावनाएं थीं, लेकिन बाजार ने रोजगार के इस क्षेत्र को असंगठित क्षेत्रों के हवाले कर दिया जिसका श्रममूल्य अत्यधिक नीचा है। इसका सीधा फायदा एकीकृत बाजारवाद तथा उदारीकरण के समर्थकों को मिला।
आजाद भारत में शिक्षा में बुनियादी सुधार संबंधी जितने भी प्रस्ताव और रिपोर्ट प्रस्तुत किये गये, उनमें शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाने की बात कही गई और कई तरह के व्यावसायिक पाठयक्रमों की अनुशंसा भी की गई। पाठयक्रम लागू भी किये गए जिसके प्रति लोगों का रवैया उत्साहपूर्ण है। इसका सबसे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि जो पाठयक्रम शिक्षा को रोजगार से जोड़ने में अपेक्षाकृत न्यून संभावनाओं वाले हैं, उसके प्रति उदासीनता बढ़ी या उसे टाइम पास जैसी मानसिकता के साथ ग्रहण किया गया। इस तरह पाठयक्रम ने रोजगार की संभावनाओं के आधार पर शिक्षित युवाओं को भयंकर रूप में वर्गीकृत कर दिया है। कला और समाज-विज्ञान जैसे संकायों के प्रति युवाओं की उदासीनता बढ़ी है। इसे इन संकायों से शिक्षा अर्जित कर रहे छात्रों की संख्या के आधार पर नहीं बल्कि रुचियों और आकर्षण के आधार पर देखना चाहिए। इसे राजधानी या महानगरों में स्थित संस्थानों- विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की रुचियों के आधार पर भी देखना चाहिए। यदि रोजगार की संभावनाओं को केन्द्र में रखकर विद्यार्थियों की संख्या का एक रेखाचित्र बनाया जाए तो वह पिरामिड की तरह का होगा जिसके ऊपरी भाग में प्रबंधन, प्रौद्योगिकी या पब्लिक सर्विस में जाने की तैयारी के लिए श्रेष्ठ संस्थानों में पढ़ रहे युवा होंगे तो नीचे क्रमश: विज्ञान, वाणिज्य और कला के सामान्य विद्यार्थी होंगे। इस तरह शीर्ष पर काबिज युवा, शेष समुदाय से स्वयं को अलग कर लेते हैं। चिन्ता की बात यह है कि शीर्ष के युवा जब रोजगार प्राप्ति की दृष्टि से असफल हो जाते हैं तो समाज में उनके लिए जगह नहीं होती। वे अकेलेपन, आत्म-निर्वासन और अजनबीयत के शिकार हो जाते हैं। इस संदर्भ में अमरकांत की कहानी ‘डिप्टी कलेक्टर’ उल्लेखनीय है।
भारत का शिक्षित शारीरिक और मानसिक श्रम बाजार, शिक्षितों के एक छोटे से अंश को अपने भीतर जगह देता है। इसलिए रोजगार उनके भीतर एक असुरक्षा पैदा करती है। आजाद भारत में कोई ऐसा ढांचा आज तक विकसित नहीं किया जा सका है जो शिक्षा से लैस युवाओं को रोजगार की गारंटी प्रदान कर सके या ऐसी स्थिति के न होने पर क्षतिपूर्ति स्वरूप उनके जीवन को चलाने की कोई सुचारू व्यवस्था कर सके। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि शिक्षा का आर्थिक मूल्य तो किसी हद तक विकसित हुआ लेकिन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य लगातार धूमिल होते गए। भूमंडलीकृत व्यवस्था में रोजगार की नई संभावनाओं ने राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को और भी अधिक समस्याग्रस्त बना दिया है। विशेषकर महानगरों के नव धनाढयों और संपन्नों ने शिक्षा को पूरी तरह बाजार में जीने और अपनी बोली लगाने की दक्षता में बदल दिया है। भारत जैसे देश में जहां 83 करोड़ से भी अधिक जनता रोजाना बीस या उससे कम रुपये में अपनी जिन्दगी गुजार रही है वहां 5-10-20 लाख के वार्षिक पैकेज को हड़पने वाली शिक्षा के दुष्परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। विगत दस वर्षों में नगरों-महानगरों में हत्या, डकैती, अपहरण जैसी घटनाओं में लिप्त लोगों का अधिसंख्यक वर्ग यही शिक्षित युवा ही है जो या तो ऐश के लिए या असुरक्षा के चलते इन अपराधों की ओर आकर्षित हुआ। दंगों में सक्रिय भूमिका निभाने वाला वर्ग यही है। कहना होगा कि शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त असंतोषों के विस्फोटक रूप लेने की शुरूआत हो चुकी है। प्रख्यात शिक्षाशास्त्री मूनिस रजा ने पहले ही इस ओर ध्यान आकर्षित कराया था- ”भारतीय उच्च शिक्षा का संकट न तो इसके आकार में निहित है और न ही प्रसार की ऊंची दर में। भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र का वास्तव में और अधिक प्रसार आवश्यक है ताकि वह वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक आत्म-निर्भरता के आधार पर सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण की आवश्यकताएं पूरी कर सके। भारतीय उच्च शिक्षा के संकट की जड़ें उन संरचनात्मक विकृतियों और अपर्याप्तताओं में है जो विरासत में मिली प्रणाली की जकड़ को तोड़ सकने की असमर्थता की देन है।”
एक सामान्य-सा प्रश्न जो हमारी शिक्षा पध्दति से बहिष्कृत कर दिया गया और जिसे कभी ठीक से हमारी शिक्षा पध्दति का हिस्सा ही नहीं बनाया गया कि क्या समाज की कोई प्रत्यक्ष सेवा व्यापक रूप में कभी शिक्षा का उद्देश्य बन पायेगी? इसका नकारात्मक उत्तार ही शिक्षा को केवल कमाई के जरिये के रूप में देखता है। शिक्षा एक सांस्कृतिक कर्म है जिसका उद्देश्य विषमताओं और असंतोषों का शमन करना होना चाहिए, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि रोजगार की हड़प नीति ने उसे लगातार धूर्त बनाया है। युवाओं के बीच धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, पारिस्थितिकी, बहुलता, वर्ग जैसे मुद्दों पर एक ईमानदार बहस चलाने में हमारी शिक्षण पध्दति व्यावहारिक स्तर पर नाकाम रही है। यदि वह बहस कहीं उठी थी तो युवाओं की व्यक्तिगत निष्ठा के बल पर, न कि पाठयक्रम की एक जरूरी शर्त के रूप में। इस तरह आजाद भारत में शिक्षा व्यापक रूप में शिक्षा बन ही न पाई, वह रोजगार के आस-पास ही चक्कर काटती रही। इस संदर्भ मेें शिक्षा शास्त्री कृष्ण कुमार का वक्तव्य उल्लेखनीय है- ”ऐसी साक्षरता जो शब्दों के अलावा परिस्थिति का बोध कराती है, शिक्षा बन जाती है। इसके विपरीत जब शिक्षा जीवन और समाज की परिस्थिति से कट जाती है तब वह साक्षरता बन कर रह जाती है।” इसलिए हमारे समय के जागरूक युवाओं को अब साक्षरता को शिक्षा बनाने की दिशा में कुछ निश्चयात्मक कदम उठाने होंगे और एक ऐसा सामाजिक दबाव पैदा करना होगा जिससे शिक्षा के वास्तविक उद्देश्यों को पाने की दिशा में नीतियां बननी शुरू हां।
                                                                                                                          बसंत त्रिपाठी

2 Comments

  1. समस्त आंजना परिवार का स्वागत है |

    यह एक सुखद संयोग है कि आंजना परिवार ने अपने आपको देश और काल के अनुरूप बदला है और यह वेबसाइट आंजना परिवार के लिए इसी बदलाव की देन है |

    आंजना परिवार महज एक समाज नहीं है, एक वर्ग विशेष नहीं है अपितु एक विचार है जिसने मानव जाति के लिए कई कार्य किये है, मानव समाज को कई रत्न दिए हैजिसके फलस्वरुप मानव जाति का कल्याण हुआ है|

    समस्त आंजना परिवार व वेबसाइट देखने वालो से अनुरोध है कि अधिक से अधिक सदस्य आंजना परिवार कि वेबसाइट से जुड़े और समाज के कार्यक्रमों में भाग लेकर समाज के पावन कार्य में अपना सहयोग दे GORDHAN PATEL Vil/post: Lordi pandit ji via: lawera bawdi
    District: Jodhpur (Raj.)-342037

    BALA JI TURS & TREVLS JODHPUR MO.07568093122

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  2. मन में इसी सुविचार का सुविचार हो सन चार में बस प्यार का संचार हो जनतंत्र के जज़्बात को जीमें नहीं जोगी की या जुदेव की नाराज़गियाँ नभ में कबूतर तो दिलेरी से उड़ें ना हो दलेरों की कबूतर बाजियाँ कौवों का गिद्धों का न स्वेच्छाचार हो सन चार में बस प्यार का संचार हो रूखे पड़े दिल बेरुखी से भर गए पड़ती नहीं है प्रेम की परछाइयाँ सब तेल घी तो तेलगी जी पी गए बाकी कहाँ है स्नेह की चिकनाइयाँ चिकनाइयों पर यों ना अत्याचार हो सन चार में बस प्यार का संचार हो खंदक में खुंदक से किया बंधक जिसे लो तेल लेकिन गंध गंधक की न हो सहमे हुए दहले हुए दिल में कभी आतंक से बढ़ती हुई धक-धक न हो दिल में गुणों की गुनगुनी गुंजार हो सन चार में बस प्यार का संचार हो मगरम GORDHAN PATEL Vil/post: Lordi pandit ji via: lawera bawdi
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