"इच्छाशक्ति"

 इच्छाशक्ति का सवाल 

राजनीति में लोकप्रियता पाने के सस्ते टोटकों का मुकाबला करने की इच्छाशक्ति अब एक दुर्लभ वस्तु बन चुकी है। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले, अपनी प्रतिबद्धता और बौद्धिकता के नगाड़े पीटने वाले राजनेता भी अपने वास्तविक जीवन में रीयल पोलिटिक का रोना रोते नजर आते हैं। ऐसे में अर्से बाद देश के किसी हिस्से में मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के नमूने दिखाई पड़ना एक सुखद आश्चर्य है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दिनों कुछ ऐसे फैसले किए हैं, जिन्हें पॉपुलिस्ट सियासत के खिलाफ मिसाल की तरह पेश किया जा सकता है। 


राजधानी पटना का नाम पाटलिपुत्र करने से जुड़े अपने सहयोगी दल बीजेपी के प्रस्ताव को उन्होंने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि शहर का नाम बदलने से अच्छा होगा इसका प्राचीन गौरव इसे वापस दिलाना। विधायक विकास निधि को समाप्त करने का उनका फैसला भी इसी शृंखला की एक कड़ी है। सभी जानते हैं कि सांसद विकास निधि और विधायक विकास निधि के नाम पर हर साल जाने वाले करोड़ों रुपयों का ज्यादातर हिस्सा पानी में ही जाता है। नरसिंह राव की अल्पमत सरकार ने अपना दीर्घजीवन सुनिश्चित करने के लिए इस योजना की शुरुआत की थी और तलवार की धार पर डोल रही अटल बिहारी वाजपेयी की तेरह महीने वाली सरकार ने इस मद में जाने वाली रकम दोगुनी कर दी थी। 

इसके खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए, याचिकाएं दायर हुईं और मीडिया ने अपने स्टिंग ऑपरेशनों के जरिए इसमें मौजूद घपलों की बानगी भी पेश कर दी, लेकिन न तो केंद्र सरकार ने, न ही किसी भी राज्य की सरकार ने इस किस्से को खत्म करने की हिम्मत दिखाई। भारत की शासन प्रणाली में ऐसी व्यवस्था पहले से मौजूद है कि जिलों के विकास और इन्फ्रास्ट्रक्चर संबंधी खर्च का ब्यौरा सांसदों, विधायकों और स्थानीय निकायों से जुड़े लोगों की राय से ही तय किया जाता है। लिहाजा यह मानने का कोई कारण नहीं है कि कुछ रकम को इस प्रक्रिया से बाहर करके सांसदों, विधायकों की मर्जी पर छोड़ देने से स्थानीय विकास का स्तर सुधर जाएगा। 

जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी कानून बनाने के अलावा अपने-अपने क्षेत्रों की हर समस्या से जुड़े रहने और उनका समाधान खोजने की है, महज एमपी-लैड्स और एमएलए-लैड्स के तहत आने वाली योजनाओं पर नजर रखने और उनमें अपने लिए गुंजाइश बनाने की नहीं। 

सत्ता की बागडोर संभाल रहे राजनेताओं में अगर इच्छाशक्ति हो तो ऐसी झालरों-फुंदनों से पीछा छुड़ाकर वे शासन प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त बनाने के अपने मूल काम में संलग्न हो सकते हैं। लेकिन चुनाव जीतने से लेकर सरकार बनाने तक राजनीति का समूचा ढांचा ही जब क्षुद्रता, संकीर्णता और निकट दृष्टि दोष का शिकार हो गया हो तो इसकी उम्मीद भला किससे की जाए? नीतीश कुमार ने ऐसे कदमों से अपनी जिम्मेदारी और बढ़ा ली है, क्योंकि पहली बार की तरह उनकी दूसरी पारी भी अगर कामयाब रहती है तो इसका दबाव पूरे देश के राजनीतिक दायरे में महसूस किया जाएगा।

साभार : नवभारत (संपादकीय)

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