परोपकार का दंभ

 परोपकार का दंभ 
क गुरु अपने शिष्यों से कहते थे कि दिन भर में एक नेक कार्य अवश्य करना चाहिए। इससे ही जन्म सफल होता है। एक दिन गुरु ने उत्सुकतावश शिष्यों से पूछा कि कल किस-किसने कोई नेक कार्य किया था? 

उनके तीन शिष्यों ने कहा कि उन्होंने नेक कार्य किया था। गुरु ने उनमें से एक से पूछा, 'बताओ कल तुमने क्या नेक कार्य किया?' शिष्य बोला, 'गुरुजी, मैंने एक असहाय बुढि़या को हाथ पकड़कर सड़क पार करवाई।' गुरु ने उसकी पीठ थपथपाई, फिर दूसरे से वही प्रश्न किया। दूसरा शिष्य बोला, 'गुरुजी, मैंने भी एक बुढि़या को सड़क पार कराई।' 

फिर गुरु ने तीसरे शिष्य की ओर नजरें घुमाईं। उसने भी यही कहा कि मैंने एक वृद्धा को सड़क पार कराई। तीनों की एक ही जैसी बात सुनकर गुरुजी को संदेह हुआ। वह बोले, 'भला ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम तीनों ने ही वृद्धा को सड़क पार कराई। तुम तीनों एक ही वृद्धा को सड़क पार कैसे करा सकते हो?' इस पर तीनों एक साथ बोले, 'गुरुजी जब हम जा रहे थे तो रास्ते में हमें एक वृद्धा मिली। 

हमने उसे सड़क पार कराने के लिए कहा तो वह बोली कि मुझे सड़क पार नहीं करनी है। इस पर हम तीनों ने उसे जबरदस्ती पकड़कर सड़क पार कराई।' उनकी बात सुनकर गुरुजी दंग रह गए। उन्होंने शिष्यों को समझाते हुए कहा, 'नेक कार्य तब होता है जब वास्तव में परोपकार किया जाए। केवल परोपकार का दंभ भरने के लिए किया गया कार्य परोपकार नहीं कहलाता।' तीनों शिष्यों ने अपनी गलती के लिए गुरु से क्षमा मांगी।

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