मूर्खों की चिंता

 मूर्खों की चिंता 
हान दार्शनिक सुकरात बेहद साधारण जीवन जीते थे। उन्हें जो मिल जाता वह उसी में संतोष करते थे। उनके प्रशंसकों और मित्रों की एक बड़ी जमात थी।  एक दिन दोपहर में सुकरात विश्राम कर रहे थे। तभी उनके कुछ मित्र आ गए। सुकरात ने आगे बढ़कर स्नेहपूर्वक उनका स्वागत किया। फिर अनेक मुद्दों पर बातचीत होने लगी। बात करते हुए अचानक सुकरात को ख्याल आया कि उन्होंने तो मित्रों से भोजन के बारे में पूछा ही नहीं। सुकरात ने अपने दोस्तों से कहा, 'माफ कीजिए, मैं एक बात तो पूछना भूल ही गया। यह बताएं कि आप लोग भोजन करके आए हैं या आप सबका भोजन तैयार कराऊं ?' 

मित्रों ने कहा, 'भोजन हुआ तो नहीं है। यदि कष्ट न हो तो तैयार कराएं।' सुकरात घर के अंदर गए। उन्होंने पत्नी से कहा, 'मेरे कुछ दोस्त आए हुए हैं। उनके लिए भोजन का प्रबंध करना है।' पत्नी नाराज हुई। बोली, 'आप कैसी बात कर रहे हैं। आखिर घर में रखा ही क्या है जो मेहमानों को प्रस्तुत किया जाए। अभी तो प्रबंध होना संभव नहीं।' सुकरात ने कहा, 'घर में जो कुछ है, वही तैयार कर मेहमानों को परोस दो। कोई परेशानी नहीं है।' पत्नी बोली, 'अच्छा नहीं लगेगा। अपनी बात अलग है। मेहमान क्या सोचेंगे और क्या कहेंगे।' सुकरात हंसे और बोले, 'तुम जो कुछ है वही तैयार कर लो। यदि वे बुद्धिमान होंगे तो हमारी मजबूरी समझेंगे और कुछ न कहेंगे और यदि बुद्धिमान न हुए, मूर्ख हुए तो जो कहना चाहें कहें। हम मूर्खों की चिंता क्यों करें।' 

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