आलेख : भ्रष्टाचार से बेहाल भारत


Corruption
 भ्रष्टों से बेहाल भारत 

जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाला... अपने मुल्क में घोटालों की फेहरिस्त काफी लंबी है। तकलीफ इस बात की है कि ये घोटाले अब हमें झकझोरते नहीं हैं, बल्कि किसी भी दूसरी खबर की तरह आकर चुपचाप गुजर जाते हैं। हां, कुछ लोग जरूर हो-हल्ला मचाते हैं, लेकिन देशहित में नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक फायदे की गरज से। आम आदमी को भी शायद इसलिए इनमें कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि कागज की कोठरी में कालेपन से वह खुद भी अछूता कहां रहा है? पांव पसारते भ्रष्टाचार पर खास रिपोर्ट : 

भारत में छोडि़ए, दुनिया में किसी भी देश में सदाचार के ताबीज आसानी से नहीं मिलते। जिन्हें मिलते हैं, वे भी इनका इस्तेमाल करने से पहले कई बार सोचते हैं। सदाचार हमारे समाज और संस्कृति का पुछल्ला भी नहीं रह गया है। अगर आप एक सप्ताह सदाचार के साथ और अपने आपको ठीक रखते हुए बिता लेते हैं तो आपको जरूर अजीब लेकिन सत्य प्राणी माना जाएगा। 


जमाना भ्रष्टाचार का है और जैसा कि बड़े-बड़े यानी पहली दुनिया के कहे जाने वाले देश करते हैं, बडे़-बड़े देशों की बड़ी-बड़ी पत्रिकाएं बडे़-बडे़ सर्वेक्षण छाप कर साबित करती हैं कि तीसरी दुनिया (जिसमें तमाम खगोलीय आर्थिक तरक्की के बावजूद भारत अब तक बना हुआ है) में भ्रष्टाचार का पैमाना काफी ऊपर है। कुल मिलाकर हम जिस समय में रह रहे हैं, वहां हमें अपने आपको समकालीन बनाए रखने के लिए भ्रष्ट साबित करना ही होगा। विकल्प दो ही हैं या तो भ्रष्ट कहलाओ या फिर बेवकूफ। आप चुन लीजिए! 


भ्रष्टाचार की यह गंगोत्री राजनैतिक प्रतिष्ठान में से निकलती है। यह प्रतिष्ठान गोमुख के रास्ते की तरह बहुत ऊबड़-खाबड़ है। अब तो भ्रष्टाचार बाकायदा ईमानदारी का धंधा बन गया है और दुनिया में भ्रष्टाचार नापने वाली एक बड़ी संस्था ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल हर साल चंदे में तीन-चार सौ करोड़ रुपये हासिल करती है। इस रकम से वह निर्वाचित भ्रष्टाचार को पारदर्शी बना देती है। इस बार इस संस्था का गणित है कि आठ अरब डॉलर सिर्फ रिश्वतों में खर्च किए गए। हो सकता है कि यह गणित भारत के राजा-रानी के खेल के पहले का हो। 


हाल अपने देश का 
2010 के लिए भारत को दुनिया के 178वें सबसे ईमानदार देश की गिनती में ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल ने रखा है। पिछले साल हम इस प्रतिभा सूची में 191 नंबर पर थे। यह लिस्ट ऊपर से नीचे की तरफ आती है यानी भारत ने तरक्की की है। अब तो भ्रष्टाचार अनुपात इंडेक्स बन गया है, जो शेयर बाजार की तरह बार-बार बदलता रहता है। भारतीय राजनीति के जो आयाम हैं, उन्हें देखकर ही समझा जा सकता है कि देश को दुराचार और भ्रष्टाचार से मुक्ति सिर्फ राजनीति दिलवा सकती है, मगर जो राजनीति अपने सड़कछाप चुनाव चिह्नों के बावजूद हेलिकॉप्टरों ने नीचे नहीं उतरती, उसकी काली आकाशगंगा को अपन कहां तक ठीक कर सकते हैं। 


जुलाई 2008 में वॉशिंगटन पोस्ट ने लिख दिया था कि भारतीय संसद के 540 सदस्यों में से एक-चौथाई बाकायदा घोषित अपराधी हैं। पूरे विवरणों के साथ कहा गया था कि इन पर हत्या से लेकर तस्करी, बलात्कार, रिश्वत, ठगी और जालसाजी के आरोप हैं और ज्यादातर के खिलाफ ऐसे सबूत हैं कि आरोप साबित होने में बहुत दिक्कत भी नहीं आएगी। सदाचार का ताबीज निकाल कर भारत के राजनैतिक प्राणियों ने वॉशिंगटन पोस्ट को दौड़ा लिया था और माफी मांगने को कहा था। वॉशिंगटन पोस्ट ने उलटे भारत सरकार से कहा था कि उन्होंने जो आंकडे़ दिए हैं, उनका खंडन किया जाए तो वे माफी मांग सकते हैं। खंडन करने के लिए कलेजा चाहिए, सो वह नहीं हुआ। 


स्वीडन की 'करप्शन क्लॉक एंड टाइम फ्रेम' संस्था की ओर से एक सर्वेक्षण हुआ, जिसमें कहा गया था कि 1948 से 2008 के बीच 20 लाख करोड़ रुपये की रकम गलत-सलत तरीकों से विदेशी खातों में भारत से गई और यह भी बताया गया था कि यह रकम भारत के जीडीपी का करीब 40 फीसदी है। 1950 से 1980 तक के 30 बरसों में जब भारत की इकॉनमी विकसित हो रही थी तो कोटा परमिट लाइसेंस का राज था। उस जमाने में भी रेल का कंडक्टर आपको सोने की जगह देने के पांच रुपये ले लिया करता था। इसी चक्कर में दलाल बढ़ेे और विकास धीमा हुआ। 


... गर हो जाती कार्रवाई 
भारत के भूतपूर्व गृह सचिव एन. एन. वोहरा की एक रिपोर्ट 1993 में आई थी। इस रिपोर्ट में भारत में अफसरों और नेताओं के कर्मकांडों की जांच-पड़ताल की गई थी और चूंकि यह सरकारी जांच थी इसलिए स्वाभाविक तौर पर सरकारी एजेंसियों ने सरकारी प्रश्नावली का सरकारी ढंग से सरकारी उत्तर दिया था और यह सरकारी तौर पर बताया था कि जहां हाथ रख दो, वहां भ्रष्टाचार का पौधा उग आता है। भ्रष्टाचार की इस बागवानी पर भी काफी सवाल उठे थे और कम-से-कम तीन राज्यों की विधानसभाएं तो अपने यहां के जंगल काटने को तैयार हो गई थीं लेकिन शायद सदाचार के ताबीज का ही कमाल था कि जो सच एन. एन. वोहरा को दिख गया, वह विधानसभाओं और संसद को नहीं दिखा। और तो और, वोहरा कमिटी की मुख्य रिपोर्ट के परिशिष्ट उनमें मौजूद पुख्ता दस्तावेजों की वजह से छापे नहीं गए। आज भी अगर उन्हें प्रकाशित किया जाए तो बड़े-बड़े चेहरों के आभामंडल टूटने की बहुत प्रचंड आवाजें होंगी। 


समस्या यह है कि अब भ्रष्टाचार हमारी आदत में शामिल हो गया है। यह अपवाद नहीं, सच बन गया है। हमें शर्म नहीं आती, जब हम थोड़े से लेकर ज्यादा पैसे देकर अपने बिजली के बिल और मकानों के दस्तावेज ठीक करवा लेते हैं। समाज में पसरे भ्रष्टाचार को हम तब भी गाली देते हैं लेकिन काम भी उसी से चलाते हैं। जुलाई 2008 वाली वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट में सबसे ज्यादा आपराधिक मामलों के अभियोगी उत्तर प्रदेश विधानसभा में पाए गए थे। 


ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल भारत के बारे में हर साल कहती है कि देश के आधे से ज्यादा लोग (उनमें बच्चे भी शामिल हैं) यह जानते हैं कि भ्रष्टाचार क्या होता है और कैसे किया जाता है? इसी रिपोर्ट में लिखा है कि बाबूशाही और अफसरशाही, दोनों ही खासतौर पर दक्षिण-पूर्व एशिया में भ्रष्टाचार को पनपाने में आदर्श माली का काम करते हैं। यह भी लिखा गया है कि सरकारी लोग आमतौर पर सरकारी संपत्ति की चोरी करते हैं। हाल ही में जिस बिहार में विकास के नाम पर ढोल-नगाडे़ बजाकर चुनाव हुआ है, वहां औसतन 80 फीसदी गरीबों को दिया जाने वाला अनाज वे लोग खा जाते हैं, जिनका उससे कोई संबंध नहीं होता। पूरे देश की नगरपालिकाओं, ग्राम पंचायतों और जिला पंचायतों में माफिया राज चल रहा है, इसके सबूत मिलते जा रहे हैं लेकिन हम भारतीय अपने घर में महात्मा गांधी की तस्वीर लगा कर और ऑफिस या दुकान जाने से पहले जल्दी-जल्दी बजरंग बली को याद कर अपने आपको अपनी ही नजर में कलंक मुक्त कर लेते हैं। कलंक हमारा है और मुक्त करने का तरीका भी हमें ही खोजना है। इसमें वॉशिंगटन पोस्ट वगैरह कहां से आ गए? 


ठेकों, लाइसेंसों और परमिटों में घपले इतने चलते हैं कि अगर हम लोग खुद नहीं भुगत रहे हों तो हमें आनंद आ जाता। बाढ़ और सूखा एक पूरे-के-पूरे वर्ग के लिए आनंद का उत्सव लेकर आते हैं। राहत का सामान उनकी कई पीढि़यों को राहत दे जाता है। कुछ लोग पकड़े जाते हैं, कुछ लोगों के खिलाफ जांच होती हैं, कुछ के खिलाफ जांच के ऐलान होते हैं, जिन्हें कभी पूरा नहीं किया जाता। अब सबसे बड़ी बात यह है कि हम बडे़-से-बड़े घोटाले और उनके तथाकथित सदाचारी पात्रों के चेहरों से नकाब उठ जाने, तमाम टेप सुन लेने, तमाम दस्तावेज देख लेने के बावजूद चौंकते नहीं है। डाविर्न के सिद्धांत के बाद अनुकूलीकरण का जो सिद्धांत आया था, उसे हमने बगैर पढ़े अपना लिया है। हमने अपने आपको भ्रष्टाचार के प्रति अनुकूलित कर लिया है। 


कुछ लोग हैं, जो उम्मीद का आंचल नहीं छोड़ते। वे पानीपत और प्लासी के मैदान में रास होने की कल्पना करते ही रहते हैं। उनके लिए यह दुनिया अटपटी जरूर है लेकिन उनके शकों और संकटों का निबटारा भी शायद इसी दुनिया में हैं। अगर हम शास्त्रों वाले सतयुग से 21वीं सदी के कलयुग तक आ पहुंचे हैं और अभी तक हमारा अस्तित्व और वर्चस्व बरकरार है तो इसका एकमात्र सीधा मतलब यही होता है कि अभी सारी उम्मीदें खत्म नहीं हुई हैं। 


सिर्फ उन उम्मीदों तक पहुंचना है और इसमें सदाचार का ताबीज शायद कुछ मदद कर सके। वैसे ताबीजों और तमगों के भरोसे जंग नहीं जीती जाती और करनेवाले भूदान और गोदान में भी घपला करते हैं लेकिन सब कुछ बुरा हो रहा है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अच्छा होने की कल्पना से भी हम अपने आपको दूर कर लें। 


हाल दूसरे देशों का 
रूस के प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन आखिरकार गुस्से में उबल ही पड़े। पुतिन का कहना है कि भ्रष्टाचार के जितने भी दोषी हैं, उन्हें कायदे से तो फांसी पर चढ़ाया जाना चाहिए मगर रूस में फांसी का रिवाज नहीं हैं इसलिए पुतिन ने जनता से पूछा है कि आखिर दूसरों की संपत्ति हजम करने वालों के खिलाफ क्या सजा तय की जाए? 


जब भ्रष्टाचार समाज की जीवनशैली बन गया है तो कुछ जीवन छीनने से यह शैली बदलने वाली नहीं है। अफ्रीका के मोजांबिक में सरकार ने कुछ वक्त के लिए दूसरों का पैसा हड़प करने और किसी की संपत्ति हजम करने के मामलों में सीधे मौत की सजा का इंतजाम किया था, मगर जल्दी ही पता लगा कि इंसाफ के चक्कर में कई बेगुनाह भी फांसी पर चढ़ गए। इस प्रथा को बदल कर अब वहां 'काली करतूतों का द्वीप' नाम से एक ठिकाना बनाया गया है, जहां बंद कमरों में भ्रष्टाचार के आरोपियों को रखा जाता है और उनकी सबसे बड़ी यातना यह होती है कि उन्हें पूरी जिंदगी तीनों वक्त एक ही खाना दिया जाता है। 


यूरोप के कई देशों में अलग-अलग रिवाज हैं लेकिन उनका सार एक ही है कि समाज और सरकार का पैसा वापस मिलना चाहिए। दोषियों को सजा भले ही बाद में मिलती रहे या नहीं भी मिले! कुल मिलाकर कहानी यह है कि डेनमार्क में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वालों और इस्लाम के खिलाफ अभियान चलाने वालों को उनकी तमाम जालसाजियों के बावजूद कोई सजा नहीं दी गई और ऐसा इसलिए हुआ कि छपे हुए कागजों की जालसाजी वहां तब तक गुनाह नहीं है, जब तक कागज सरकारी नहीं हों। 


दो हफ्ते पहले चीन के पूर्व चीफ जस्टिस को उनके कार्यकाल में किए गए घपलों के साबित हो जाने के बाद सरेआम शंघहाई में फांसी चढ़ाया गया। इसी तरह जर्मनी, कोरिया और कनाडा में कई बरसों तक सदाचार का बड़ा जोर रहा। जर्मनी में कई भ्रष्ट अधिकारियों को बाकायदा फांसी पर चढ़ाया गया और उनकी लाशें सड़ने के लिए छोड़ दी गईं। इसका नतीजा यह हुआ कि आखिरकार भ्रष्टाचार के जाली मामले आपसी हिसाब निपटाने के लिए बनने लगे और हद तो तब हो गई, जब एक मामले की सुनवाई कर रहे जज को ही दोनों पक्ष के वकीलों ने भ्रष्ट साबित कर दिया। अगर वहां की न्यायपालिका सचेत और सक्रिय नहीं होती तो जज साहब भी फांसी पर लटक जाते। 


बैन दरअसल किसी भी किस्म के भ्रष्टाचार को खत्म नहीं कर सकता। आज तक कहीं नहीं कर पाया। असल में भ्रष्ट होने के पीछे दूसरों का हक हड़प करने की जो शाश्वत कामना होती है, वह किसी कानून के दायरे में नहीं आती। भारत जैसे देश में तो हालत यह है कि अगर सरकारी विभागों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों से, विधायिका और कार्यपालिका के अलावा न्यायपालिका से भी अगर पाप कर रह लोगों को हटा लिया जाएगा तो पूरी व्यवस्था ही ठप पड़ जाएगी। 


किससे करें शिकायत 
भ्रष्टाचार से लड़ने की जिम्मेदारी समाज की है। लोकायुक्त से लेकर अदालतों के जो न्यायसंगत संगठन बनाए गए हैं, वे समाज की सहायता करने वाले ही हैं, मगर जब तक उन्हें शिकायत नहीं मिलेगी, तब तक वे भी हाथ बांधे बैठे रहेंगे। अलग-अलग राज्यों में लोकायुक्तों, लोक अदालतों और सूचना आयुक्तों के अलावा दूसरी न्याय संस्थाओं के खिलाफ भी शिकायतें मिलती ही हैं। राज्य सरकारों तक तो लोकायुक्त हैं भी, लेकिन केंद सरकार में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिमंडल को समेटने वाला लोकपाल का पद सिर्फ संविधान में रचा रह गया है और इसे अमली जामा कौन, कैसे, कब पहनाएगा, यह किसी को पता नहीं है। 


भ्रष्टाचार की परिभाषाएं देश, काल, परिस्थितियों के हिसाब से सापेक्षतावाद के हिसाब से बदलती रहती हैं और इसीलिए लगभग संविधान के स्तर की कोई किताब होनी चाहिए जो काले, सफेद अक्षरों में परिभाषित कर दे कि किस सीमा तक भ्रष्टाचार समाज या देश सहन कर सकता है और कहां से उल्लंघन की सीमा शुरू होती है। सारे सरकारी नियम और संहिताएं कोई अमृत से नहीं लिखी गई हैं, जिन्हें मिटाया नहीं जा सके। जरूरत है तो सिर्फ इस बात की कि समाज और प्रतिष्ठान भ्रष्टाचार के तत्वों को पहचानें और पहचान कर इस पाप से मुक्ति पाने का इंतजाम करें। वरना दलाली से लेकर तमाम किस्म की भाड़गीरी को भी हम मान्यता देते रहेंगे और किताबों में सिर्फ कक्षाओं से आवाज आती रहेगी कि हमारा देश एक महान देश है। 


क्या है हल 
चाणक्य नीति से लेकर दंड विधान तक एक समान विचार लगातार चलता रहा है और इसका सार यह है कि अभियोगी और अपराधी को उन सभी लाभों से वंचित कर दो, जो उसने भ्रष्टाचार के जरिए अर्जित किए हैं। अपने देश में जहां नगरपालिकाओं और कचहरियों के मामूली कर्मचारी भी करोड़पति पाए जाते हैं और जब छापे पड़ते हैं, तो जूनियर इंजीनियरों की भी कोठियां पाई जाती हैं, वहां इन लोगों के परिवारों को निकाल कर झुग्गी-झोपड़ी में रख दिया जाए और सड़क की सफाई करवाई जाए तो शायद बाकी लोग सुधर जाएं। हाल में नीतीश कुमार ने एक भ्रष्ट सरकारी अफसर की कोठी को जब्त करके वहां स्कूल खोल दिया। इस तरह की घटनाएं तमिलनाडु और केरल में भी हो चुकी हैं। ये घटनाएं मिसाल बन सकती हैं।

साभार -  आलोक तोमर 
नवभारत टाइम्स

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